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गांधीजी का एक और ताबीज: खानपान और

बापू की जीवनी को समर्पित राजेंद्र कृष्ण लिखित ये पंक्तियाँ हमें उनके जीवन का सार समझाने की कोशिश करती हैं!

गांधीजी के विषय में मेरे एक मित्र का कहना था कि ‘उस ज़माने में संचार के इतने परिपक्व माध्यम नहीं थे फिर भी गांधीजी जहाँ जाते थे एक बड़ा हुजूम उनके पीछे-पीछे चलने लगता था तो कुछ तो बात थी उनमे!”
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सार्वजनिक जानकारियों में हम बापू को एक सत्याग्रही, अहिंसावादी, स्वछता-प्रेमी, क्रांतिकारी, लेख़क, वक्ता, आज़ादी के नायक, एवं मसीहा के तौर पर जानते होंगे लेकिन इन पहलुओं से गांधीजी के जीवन का एक कोना ही हम तक पहुँचता है.

गांधीजी के सबसे बड़े बेटे हरिलाल की गांधीजी से एक न बनती थी इसलिए उन्होंने घर छोड़ दिया था. एक बार जब हरिलाल को पता चला कि कटनी से निकलने वाली ट्रैन में गांधीजी और कस्तूर-बा भी हैं तो वे वहाँ पहुँच गए. वहाँ जब हर कोई ‘महात्मा गांधी की जय’ के नारे लगा रहा था तब हरिलाल ने अचानक ‘कस्तूर-बा की जय’ के नारे लगाने शुरू कर दिए.

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